Monday, August 13, 2012

दो असफल आंदोलनों की गवाह बनी दिल्ली

बाबा रामदेव कह रहे हैं कि अनशन खत्म हुआ, आंदोलन नहीं। सरकार उनके आंदोलन से हिल गई। कुछ यही कहना टीम अन्ना का है। पिछले एक महीने में दिल्ली दो असफल आंदोलनों की गवाह बनी। पहले जहां दिल्ली ने टीम अन्ना के आंदोलन को निरेखा। फिर बाबा रामदेव की नौटंकी देखी। सैकड़ों लोगों को नारे लगाते और गिरफ्तार होते देखा, तो कुछ लोगों को खुद को पाक साफ और दूसरे को बिकाऊ और भ्रष्ट कहते देखा। टीम अन्ना जहां जंतर-मंतर से खाली हाथ लौटी, वही रामदेव रामलीला मैदान में लीला दिखाकर खाली हाथ लौट गए।
इन दोनों की आंदोलन से आशा की कोई किरण दिखाई नहीं दी। इसके बाद भी ये दोनों सरकार को झुकाने और अपने आंदोलन को सफल होने का दंभ भर रहे हैं। उधर, सरकार भी ये कहने में जुटी हुई है कि देश की जनता ने इन दोनों का असली मुखौटा देख लिया, लेकिन इन सब के बीच एक सवाल बरकरार है। सवाल ये कि इन दोनों आंदोलनों से देश की जनता को क्या मिला? क्या उसे भ्रष्टाचार से निजात दिलाने का कोई जरिया मिला? क्या विदेशों में जमा काले धन की वतन वापसी की किरण दिखाई दी ? जनता बड़ी उम्मीद से इन दोनों आंदोलनों के साथ जुड़ी थी। कहने को लोग तो ये भी कहते हैं कि इन दोनों आंदोलन से जनता का कोई सरोकार नहीं था। बाबा रामदेव के आंदोलन में जहां योग और धन-बल के बुते बुलाए गए लोग थे, तो टीम अन्ना के आंदोलन के साथ ज्यादातर तमाशबीन लोग जुड़े थे। हालांकि मैं इन दलीलों के साथ खड़ा नहीं हूं। इन दोनों आंदोलनों के साथ जिस तरह से भी लोग जुड़े हों, लेकिन उनके भी मन में भी भ्रष्टाचार को दूर करने की चाहत तो रही होगी। वो भी ये जरुर सोच रहे होंगे कि विदेशों में जमा कालाधन वापस आ जाता और देश के विकास में लगता तो उनके जीवन स्तर में सुधार होता, लेकिन ऐसा हो ना सका। ना टीम अन्ना और ना ही बाबा रामदेव अपने आंदोलनों के जरिए कोई ऐसा रास्ता ढूंढ़ पाए, जिससे जनता ये सोचने पर मजबूर हो कि ये जैसे भी है उनके हितैषी है। सरकार ने भी इन आंदोलनों अथवा गरीबी की मार झेल रही जनता की इच्छाओं और भावनाओं का कद्र करते हुए कोई पहल की? हां इन दोनों आंदोलनों से देश की जनता को एक चीज जरुर मिली। उसे अब ये साफ दिखाई देने लगा है कि दो हजार चौदह में होने वाले लोकसभा चुनावों में दो नई राजनीतिक पार्टियां नजर आएंगी और वो भी पुरानी पार्टियों की तरह उन्हें वादों का लॉलीपॉप थमाएंगी। मैं ये नहीं कह रहा हूं टीम अन्ना ने राजनीतिक पार्टी बनाने का ऐलान कर या बाबा रामदेव ने एनडीए नेताओं के साथ नजदीकियां बढ़ा कर कोई गुनाह किया है, लेकिन इतना जरुर कहूंगा कि इन दोनों ने राजनीति में आने और राजनेताओं का दामन थामने का जो जरिया अपनाया वो गलत है। मुझे तो इन दोनों के आंदोलनों को आंदोलन कहने से भी गुरेज है। इतिहास गवाह है कि आंदोलन जब जब हुए हैं, तो पहले विनाश और फिर विकास के रास्ते निकले हैं, लेकिन इन दोनों के आंदोलनों से सिर्फ और सिर्फ विनाश हुआ है। आम लोगों की समय की बर्बाद हुई है। उन्हें मुसीबतों का सामना करना पड़ा है। पैसे की बर्बादी हुई है। इन दोनों ने ही भोली- भाली जनता को मूर्ख बनाने की कोशिश की है।

Thursday, August 2, 2012

निजी स्वार्थ की वजह से विफल हुआ अन्ना का आंदोलन

किसी व्यंजन को बनाने के लिए उसे तैयार करने में इस्तेमाल होने वाले पदार्थों का तय मात्रा में इस्तेमाल करना जितना जरुरी होता है। ठीक उसी तरह से किसी भी आंदोलन की सफलता और असफलता के लिए निश्चित लक्ष्य, समर्पण, त्याग और स्वार्थ ये चार कारक बराबर जिम्मेदार होते हैं। जब तक इन कारकों में सामंजस्य बना रहता है,आंदोलन सुचारू ढंग से चलता है। पब्लिक बर्बस उस आंदोलन से जुड़ती जाती है, लेकिन संतुलन बिगड़ते ही पब्लिक दूर भागने लगती है और आंदोलन टूट कर बिखर जाता है। टीम अन्ना के आंदोलन से साथ भी यही हुआ। जब तक टीम अन्ना एक लक्ष्य को निर्धारित कर समर्पण की भावना से स्वार्थ पूर्ति के लिए आगे बढ़ रही थी। जनता भावनात्मक रुप से उसके साथ जुड़ती जा रही थी। यहां पर मैंने स्वार्थ पूर्ति शब्द का इस्तेमाल किया है। इस वजह से पहले ये बताना जरुरी है कि स्वार्थ का आशय निजी स्वार्थ नहीं अपितु सर्वजन हिताय है। दुर्भाग्य से इसी शब्द का गलत इस्तेमाल किया गया और टीम अन्ना के आंदोलन की असफलता के लिए सबसे ज्यादा यही जिम्मेदार है। जिस दिन से टीम अन्ना अपने लक्ष्य और स्वार्थ का विस्तार किया, उसी दिन से आंदोलन की विफलता की कहानी गढ़ी जाने लगी थी। शुरुआती दौर में टीम अन्ना ने जनलोकपाल और सरकारी तंत्र की आलोचना को अपना लक्ष्य बनाया था। देश की जनता की भलाई को स्वार्थ के तौर पर साधा था। इसी वजह से जनता उनके साथ जुड़ती जा रही थी। ये जुड़ाव भावनात्मक था और जब जुड़ाव भावनात्मक हो, तो कुछ भी करने का मादा रखता है। दुर्भाग्य से ऐसा हो ना सका। इसके लिए टीम अन्ना ही जिम्मेदार है। टीम अन्ना ने जनलोकपाल की आड़ में देशभर में चुनावों में प्रचार कर पब्लिसिटी गेन करने की चाहत, भ्रष्ट मंत्रियों की करतूतों की जांच के लिए एसआईटी का गठन, सरकारी तंत्र की जगह हर किसी की आलोचना...यहां तक की मीडिया को भी नहीं बख्शा। टीम अन्ना यहीं नहीं रुकी। आम लोगों को सिविल सोसाइटी कहने की बजाय भीड़ कह कर पुकारने लगी। स्वार्थ शब्द को सर्वजन हिताय की जगह निजी स्वार्थ बना लिया। उसी दिन से जनता अन्ना के आंदोलन से दूर भागने लगी। अब टीम अन्ना एसएमएस के जरिए और जंतर-मंतर पर आए लोगों को देखकर इतरा रही है कि पब्लिक उसके साथ है, तो उसे इसका पूरा हक है, लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर है। रामलीला मैदान में अन्ना के आंदोलन के साथ जुड़ने वाली जनता और जंतर-मंतर पर आने वाली जनता में काफी फर्क है। रामलीला मैदान में आंदोलन के समय देशभर में ऐसी जनता जुड़ी थी, जिसे इस आंदोलन से सरोकार था। जो इस आंदोलन की खूबियों और परिणामों को जानती थी, लेकिन जंतर-मंतर पर ऐसा नहीं था। जंतर-मंतर पर अन्ना के आंदोलन ने निजी स्वार्थ का रुप ले लिया था। जनता तमाशबीन बन गई थी। यही वजह है कि आधुनिक तंत्र का सुंदर तरीके से इस्तेमाल करने में माहिर टीम अन्ना के धुरंधरों को घुटने टेकने पड़े। उसे देशहित के आडंबर को हटाकर अपने स्वार्थ को उजागर करना पड़ा। मैं इसके लिए केंद्र सरकार की धैर्य की प्रशंसा करूंगा। इसमें मुझे किसी भी तरह से हिचक नहीं है। अब जरा आप ध्यान से सोचिए कि क्या वजह है कि ट्यूनीशिया में एक मजदूर आत्मदाह करता है कि पूरे देश में आग धधक उठती है। देश में सत्ता परिवर्तन हो जाता है। एक नहीं बल्कि कई देशों में तनाशाहों का सिंहासन डोल जाता है, लेकिन टीम अन्ना के आंदोलन से ऐसा नहीं हुआ। छोड़िए दूर क्यों जाएं। भारत का ही उदाहरण ले लिया जाए। क्या वजह है कि एक ही मुद्दे पर जेपी का आंदोलन सफल हो जाता है और अन्ना का आंदोलन असफल? जबकि जेपी और अन्ना के युग में काफी फर्क है। जेपी के समय में आधुनिक तंत्र नहीं थे। कौन कहां और कब गिरफ्तार हो रहा है, किसे प्रताड़ित किया जा रहा है, इसे जानना काफी मुश्किल था? इसके बाद भी जेपी का आंदोलन अपने लक्ष्य को भेदने में सफल रहा। देश को संचालित करने का एकक्षत्र अधिकार समझने वाली कांग्रेस पार्टी को सत्ता से रुखसत होना पड़ा। थोड़े समय के लिए ही सही देश में बदलाव की बयार बही। इसको भी छोड़िए वीपी सिंह ने बोफोर्स को लक्ष्य बना कर सत्ता परिवर्तन करा दिया, लेकिन अन्ना के आंदोलन से कुछ भी हासिल नहीं हुआ। हां अन्ना के आंदोलन के शामिल कुछेक लोगों ने तो अपनी झोलियां जरुर भर ली, लेकिन देश की जनता को कुछ भी हासिल नहीं हुआ। उसे इन लोगों ने भी उसी तरह से छला, जिस तरह से राजनीतिक पार्टियां छलती हैं। मैं तो कहूंगा कि इन्होंने भोली-भाली जनता को राजनीतिक पार्टियों से भी गंदे तरीके से छला। आंदोलन की बैशाखी पर सवार होकर टीम अन्ना के कुछेक लोग मालामाल हो गए। अब आप ही बताइए जिस व्यक्ति के पास कर्ज लिए हुए पचास हजार रुपये देने के लिए नहीं है, वो ट्रेन और बस की सवार छोड़ कर एरोप्लेन से ट्रेवल करता है। ये कैसे संभव है। ये सब संभव हुआ है भोली-भाली जनता को छलने के तरीके से। जिस मनीष सिसोदिया, अरविंद केजरिवाल, गोपाल राय और संजय सिंह को कोई नहीं जानता था, वो आज टेलीविजन चैनलों पर बैठकर ज्ञान बघारते हैं। वो दूसरों को मूर्ख और खुद को ज्ञानी और जन हितैषी बताते हैं, लेकिन इंतजार कीजिए। इन लोगों का नब्बे फीसदी चेहरा तो देश की जनता देख चुकी है। बाकी दस फीसदी चेहरा भी चुनावी समर में उतरते ही नजर आ जाएगा और जब पूरा चेहरा नजर आ जाएगा, तो यकीन मानिए ये लोग अपना चेहरा फिर से ढंकने के लिए जगह और वस्त्र ढूंढेंगे और जनता इन पर कीचड़ फेंकने के लिए पीछा करेगी।

Saturday, March 24, 2012

सोची समझी रणनीति की देन है अन्ना का आंदोलन



क्रांति जुल्म की पराकष्ठा का परिणाम होती है। ये अपने साथ विनाश और विकास की एक नई दिशा लेकर आती है। हालांकि इसकी विनाश लीला ज्यादा भयावह होती है। उससे उबरने में काफी समय लगता है। इसमें जान और माल दोनों की काफी बर्बादी होती है, लेकिन एक विकासशील समाज के लिए ये अति आवश्यक भी है। पिछले दो सालों में दुनियाभर में कई क्रांतियां देखने को मिली, जो तानाशाही और भ्रष्टाचार के खिलाफ हुईं। ये क्रांति अपने साथ बर्बादी को लेकर तो आईं, लेकिन विकास की एक नई दिशा देकर गईं। ट्यूनीशिया, मिश्र, लीबिया, यूनान या दुनिया के दूसरे हिस्सों में हुईं क्रांतियां हो या फिर भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना का आंदोलन। इन सभी क्रांतियों का मकसद आम लोगों को जुल्म से मुक्ति दिलाना था। इनमें से ज्यादातर क्रांतियां या कहें, तो भारत को छोड़ कर सभी देशों की क्रांतियां सफल रही है। फिर क्या वजह रही कि अन्ना का आंदोलन विफल हो गया? आखिर क्यों आम लोग उनके आंदोलन से दूर भागने लगे? आखिर क्यों जो मीडिया अन्ना के आंदोलन का कवरेज करने पागल बना था, वो अब सवाल पूछने लगा है कि कब तक जंतर-मंतर ? आखिर क्या वजह है कि ट्यूनीशिया में एक फेरीवाल आत्मदाह करता है, तो पूरे देश में आग धधक उठती है। लोग सड़कों पर उतर जाते हैं और तब तक दम नहीं लेते हैं, जब तक तानाशाही शासन को उखाड़ नहीं फेंकते। आखिर क्या वजह है कि मोहम्मद बौउजीजी के शरीर में लगी आग की लपटें पड़ोसी मुल्कों को भी अपने चपेट में ले लेती हैं और परिवर्तन की एक नई बयार बहा देती है। लेकिन अन्ना का आंदोलन कुछ दूरी तय करने के बाद ही दम तोड़ने लगा? अगर निष्पक्ष भाव से सोचेंगे, तो ये मालूम पड़ेगा कि दूसरे देशों की क्रांतियों और अन्ना के आंदोलन में बड़ा फर्क है। ट्यूनीशिया जैसे देशों की क्रांतियां किसी सोची-समझी रणनीति की परिणीति नहीं थी। वो एकाएक जन भावना को लेकर उठीं और अपने लपटों में तानाशाही मानसिकता को जला कर भष्म कर दी। इसके विपरित भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ खड़ा हुआ अन्ना का आंदोलन एक सोची-समझी रणनीति की देन है। इसके मकसद के खाके पहले से ही गढ़ लिए गए थे। उसी रणनीति के तहत सबको भावनात्मक रुप से जोड़ने की कोशिश की गई। आधुनिक तकनीक का सुंदर इस्तेमाल लिया गया। सबको एसएमएस, मेल और फोन करके ये जताने की कोशिश की गई कि हम आपके हित की लड़ाई लड़ रहे हैं आप हमारे साथ जुड़िए। हम आपको एक नई दिशा देंगे, लेकिन इसके पीछे एक मकसद छुपा था। जिसकी पूर्ति टीम अन्ना ने एक चौहतर साल के बूढ़े को आगे रख कर पूरी की। जो वाकई कष्ट दायक है। इतिहास इसके लिए अरविंद केजरिवाल, मनीष सिषोदिया और कुमार विश्वास को कभी नहीं माफ करेगा। जिस तरह से इन लोगों ने एक भोले-भाले इंसान का इस्तेमाल किया, वो शर्मनाक है। इन लोगों की सोच कभी देश से भ्रष्टाचार को मिटाने की नहीं रही। इन लोगों का मकसद सिर्फ और सिर्फ पब्लिसिटी गेन करने की थी, जिसकी पूर्ति इन्होंने कर ली। इसी रणनीति के तहत इन लोगों ने चुनाव प्रचार में उतरे के लिए अन्ना को पटाया। अन्ना के आंदोलन ने भले ही देशवासियों को कुछ नहीं दिया हो, लेकिन इन लोगों को इतना दे दिया कि उसे पाने के बारे में इन लोगों ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। अन्ना के आंदोलन की ही देन है कि जिन लोग को मुश्किल से दो चार सौ लोग भी नहीं जानते थे, उन्हें पूरा देश जानने लगा।
अब ये लोग पूरे देश को पाठ पढ़ाने लगे।सबको झूठा और खुद को सच्चा बताने लगे है। लेकिन ये लोग भूल रहे हैं कि ये पब्लिक है। सब जानती है।

Saturday, March 10, 2012

एक मौत कई सवाल


एक मौत कई सवाल। सवाल प्राकृतिक सम्पदाओं की रक्षा की। सवाल आम लोगों की सुरक्षा की। सवाल मध्यप्रदेश की सियासत की। सवाल शिवाराज सिंह और उनके सिपारसलारों के उन दावों की, जो वो हर समय ताल ठोक कर दावे कहते हैं कि मध्यप्रदेश में सुशासन है। सवाल राजनीतिक पार्टियों की, खास कर सियासत की बागडोर संभाल रही पार्टियों की संवेदन शून्यता की, जो अकसर देखने को मिलती है। मुरैना में हुई आईपीएस नरेंद्र कुमार की मौत ने शिवराज सरकार को कटघड़े में खड़ा कर दिया है। इस मौत को लेकर हर तरफ से सवालों की बौछार हो रही है और शिवराज सरकार को उसका जवाब देते नहीं बन रहा है। इस मौत के सहारे मैं भी एक सवाल पूछ रहा हूं। हमें आजादी दिलाने वाले जांबाजों ने और देश में लोकतंत्र की स्थापना करने वाले सपूतों ने क्या यही उम्मीद की थी कि आने वाले दिनों में देश की बागडोर ऐसे संवेदनहीनों के हाथ में चली जाएगी, जो किसी शहादत की खिल्ली उड़ाएंगे। सबसे पहले मैं अपनी उस गुस्ताकी के लिए माफी मांगता हूं, जो मैंने इन सवालों की शुरुआत में की है। हकीकत जानने के बाद भी मैंने आईपीएस नरेंद्र कुमार की हत्या को मौत करार दिया है और उसी के सहारे सवाले उठाएं है। मैं इसके लिए शहीद नरेंद्र कुमार के परिजनों और पूरे देशवासियों से माफी मांगता हूं, लेकिन क्या करूं बीजेपी के तथाकथित कुछेक काबिल वक्ता ये मानने को तैयार ही नहीं है कि नरेंद्र कुमार की हत्या हुई है। उन्हीं वक्ताओं में शामिल है मीनाक्षी लेखी। ये बीजेपी महिला मोर्चा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। मीनाक्षी ने एक टीवी चैनल पर बैठकर जिस तरह से नरेंद्र कुमार की हत्या को लेकर शिवराज सरकार का बचाव किया, वो वाकई शर्मनाक था। मीनाक्षी जी ने जिस बेशर्मी का परिचय दिया, उसको देख कर ऐसा लगा कि अगर ऐसे लोगों के हाथों में हमारे देश की बागडोर है, तो ये मेरे लिए भी शर्म की बात है कि मैं भारत का नागरिक हूं। एक वरिष्ठ पूर्व अधिकारी की बार बार गुजारिश के बाद भी मीनाक्षी जी को अपनी गलती का एहसास नहीं हो रहा था। नरेंद्र हत्याकांड पर बोलते समय में मीनाक्षी की भाव भंगीमा राजनीतिज्ञों की संवेदनहीनता की कहानी बयान कर रही थी। हद तो तब हो गई जब मीनाक्षी जी ने नरेंद्र की हत्या पर अफसोस जताने की बजाए, उल्टे उन पर उगाही करने का आरोप लगा दिया।

Thursday, February 16, 2012

काश हमारे देश के नेता और धर्म पुरोधा इनसे सीखते ?


मेरा एक दोस्त इन दिनों पटियाला में कार्यरत है। वो काफी दिनों से मुझसे पटियाला आने की जिद्द कर रहा था, लेकिन हर बार मैं उससे टाल-मटोल कर देता था। उसका जब कभी भी फोन आता था, बस एक ही शिकायत रहती थी कि तुम बहुत बहानेबाज हो। पिछली बार जब उसका फोन आया, तो कॉल रिसीव करते ही आवाज सुनाई दी कि तुम्हें मेरी कसम इस बार ना मत कहना। फिर उसका सवाल सुनाई दिया कि पटियाला कब आ रहे हो ? इस बार में मैं उसे ना कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। आखिरकार मुझे उसकी जिद्द के आगे झुकना पड़ा। ऑफिस से छुट्टी लेकर मैं पटियाला के लिए निकल पड़ा। रास्ते भर दिमाग में दो तरह की बातें चल रही थी। मैं उसे कोश रहा था लेकिन उससे मिलने की खुशी मेरे भी दिल में थी। पहली ये कि अजीज दोस्त से मुलाकात होगी और दूसरी ये कि साले की जिद्द के चलते कई काम कुछ समय के लिए टल गए। उन कामों को करना जरुरी था। उन कामों को निपटा लेता, तो अगले महीने पटियाला आ जाता। ये द्वंद्व पटियाला पहुंचने के बाद मिट गए। अब मैं अपने दोस्त का शुक्रगुजार हूं कि उसने मुझे पटियाला आने के लिए जिद्द की। वैसे तो पटियाला में मैं बहुत जगहों पर घूमा। बहुत सारी चीजें यहां की अच्छी लगीं, लेकिन उनमें से भी सबसे अच्छा मुझे यहां का एक आश्रम लगा। वहां के लोग लगे। ये आश्रम है पटियाला-चंडीगढ़ रोड़ पर...खानपुर गांव में इस आश्रम को पटियाला के संस्थापक बाबा आला भगवान गिर जी ने बनवाया है। यहां के लोगों से जो जानकारियां मुझे मिली, उसके मुताबिक बाबा आला बाबा भगवान गिर जी के भक्त थे। उन्होंने डेरे के आसपास अपनी एक सौ साठ बीघे जमीन गिर जी को दान में देनी चाही, लेकिन बाबा ने जमीन को अपने नाम पर करने की बजाए बेजुबान कुत्तों के नाम करने को कह दिया, ताकि बाद में उनकी गद्दी पर बैठने वाले महंतों के मन में जमीन को लेकर कभी लालच न आए। तब से लेकर आज तक ये जमीन कुत्तों के नाम चली आ रही है। इस आश्रम में कुत्तों को तीनों टाइम मिस्सी रोटी, लस्सी समेत स्वादिष्ट व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। महंत डेरे के चबूतरे पर खड़े होकर ‘आयो.आयो’ की आवाज लगाते हैं और देखते ही देखते दूरदराज बैठे कुत्तों का झुंड वहां इकट्ठा हो जाता है। महंत अपने हाथों से इन्हें भोग लगाते है। इसके बाद श्रद्धालुओं को लंगर बांटा जाता है। सुबह-शाम इनकी आरती की जाती है। आसपास के दर्जनों गांवों के लोग कुत्तों से मन्नत मांगने आते हैं। दिल्ली पहुंचने के बाद अब हमारे मन एक बात कौंध रही है कि काश हमारे देश के नेता और तथाकथित धर्म के पुरोधा पटियाला के संस्थापक आबा आला और भगवान गिर जी की त्याग भावना से कुछ सबस लेते?

Sunday, February 12, 2012

कैसे बदलेगा समाज ?


चलो हम भी कुछ दौड़ लें। जब सब लोग दौड़ रहे हैं,तो हम क्यों पीछे रहें। इसी सोच के साथ इस समय लोग एक रेस का हिस्सा बन रहे हैं और एक-दूसरे को पछाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। कोई बैनर लगा रहा है, तो कोई सभाएं कर रहा है। कोई टेलीविजन चैनलों पर बैठकर खुद को सही और दूसरे को गलत बता रहा है, तो कई एसएमएस भेज कर लोगों से अपने साथ जुड़ने की गुजारिश कर रहा है। बात अगर यहीं तक रुक गई होती, तो कोई आपत्ति नहीं होती, लेकिन इन लोगों ने भ्रष्टाचार और भ्रूण हत्या को सिंबल बना कर, अब इस रेस में शादी जैसे पवित्र रिश्ते को भी शामिल कर लिया है। सात जन्म तक साथ जीने-मरने की कसमें खाने और एक-दूसरे के प्रति वफादार रहने के वादे के साथ लिए जाने वाले सात फेरों की रस्म को भी अब इन लोगों ने तोड़ना शुरू कर दिया है। पिछले एक सप्ताह में मध्यप्रदेश में इस तरह की दो घटनाएं देखने को मिली। पहली घटना जहां छतरपुर जिले में घटी, वही दूसरी घटना राजधानी भोपाल में। छतरपुर जिले में जहां रामनारायण और भावना नाम के दूल्हा-दुल्हन ने आठ फेरे लेकर खुद को बेटियों की हिमायती घोषित करने की चेष्ठा की। वहीं भोपाल में अंकित निखरा और रुचि नाम के दूल्हा-दुल्हन ने एक कदम आगे बढ़ते हुए नौ फेरे लिए और ये दावा कर दिया कि वो जिंदगी में भ्रूण हत्या नहीं करेंगे और न ही भ्रष्टाचार करेंगे या करने देंगे, लेकिन अब सवाल ये पैदा हो रहा है कि क्या इस दिखावेपन से भ्रष्टाचार मिट जाएगा ? क्या कन्या भ्रूण की घटनाओं पर अंकुश लग जाएगा ? इस सवाल का जवाब सिर्फ और सिर्फ ‘नहीं ’है। अगर इन लोगों को वाकई देश हित में कुछ करना है, तो ये लोग ढकोसलेपन से दूर रहें और सबसे पहले अपने मन के अंदर के पाप को मारें। ये लोग खुद सही हो जाएंगे, तो धीरे-धीरे पूरा देश सही हो जाएगा। जब तक लोगों की कथनी और करनी में फर्क रहेगा, तो समाज में बदलाव कैसे आ सकता है ? भ्रष्टाचार कैसे मिट सकता है ? भ्रूण हत्या की घटनाएं भी कैसे रुक सकती हैं ?

Saturday, February 11, 2012

किस दिशा में जा रही है भारतीयों की मानसिकता ?


इस बात के लिए तो भारतीयों के दिमाग की दाद देनी ही पड़ेगी कि अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए वो हर रोज विरोध करने का नया-नया तरीका इजात कर रहे हैं। इस विषय पर काफी दिनों तक गहन चिंतन करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि ज्यादातर भारतीयों की शातिर दिमाग बौधिक विकास और देश की उन्नति के बारे में सोचने की बजाय दूसरों को नीचा दिखाने और अपनी चाहत को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार रहता है। किसी और क्षेत्र में भारतीय आगे बढ़े हों या नहीं, लेकिन विरोध के नए-नए तरीकों को खोजने में जरुर अग्रसर हुए हैं। धरना-प्रदर्शन और मीडिया के जरिए अपने खिलाफ होने वाले अत्याचारों, शासन और प्रशासन की नीतियों की आलोचना करने की जगह लोग अब जूते-चप्पल और तमाचों का इस्तेमाल करने लगे हैं। पिछले दिन इस तरह की कई घटनाएं देखने को मिली है कि लोग ऑफिस में घुस कर किसी पर लात घुंसों की बरसात कर देते हैं, तो किसी पर किसी सभा के दौरान जूते-चप्पल फेंक देते हैं। विरोध करने की कड़ी में एक और नया तरीका जुड़ गया है। वो तरीका है शेरवानी पहन कर यानी ठाट-बाट में सज-धज कर पैरों में घुंघरू बांधना और फिर अपनी बात को कहने के लिए नाचना। पंजाब के श्रीमुक्तसर में एक पूर्व प्रिंसिपल ने खुद को बेकसूर बताने, अपनी बात को स्कूल प्रबंधन और आम लोगों तक पहुंचाने के लिए अपने पैरों में घुंघरू बांध लिए। यहां के सेंट सोल्जर कान्वेंट स्कूल के पूर्व प्रिंसिपल एमपी मित्तल इन दिनों शेरवानी और पैरों में घुंघरू पहन कर नाच रहे हैं। दरअसल मित्तल को स्कूल प्रबंधन ने कुछ समय पहले प्रिंसिपल पद से हटा दिया गया था। अब ये खुद को बेकसूर बता रहे हैं। मित्तल जी मैनेजमेंट पर धक्केशाही का आरोप लगाते हुए कहते हैं कि वो इस स्कूल में लंबे समय से प्रिंसिपल के पद पर तैनात थे और अपना काम ईमानदारी से कर रहे थे, लेकिन पिछले 12 दिसंबर को उन्हें बिना कोई नोटिस दिए पद से हटा दिया गया और स्कूल में घुसने भी नहीं दिया गया।