Thursday, November 17, 2011

खबर फिल्मी है

दोस्तों मुंबई से उड़ती-उड़ती खबर आ रही है कि काफी दिनों बाद दास कैपिटल नाम से एक दमदार हिंदी फिल्म बन रही है। इस फिल्म का निर्माण दिग्गज कांग्रेसी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय कल्पनाथ राय के दामाद मुक्तिनाथ उपाध्याय जी कर रहे हैं। बॉलीवुड के जानकारों के मुताबिक फिल्म मानव जीवन के यथार्थ पर आधारित है। इसमें मावन उत्पीड़न को ब्यंगातमक तरीके से पेश करने की कोशिश की गई है। फिल्म में मनोरंजन का भी भरपूर मशाला है। फिल्म का निर्देशन श्याम बेनेगल के सहयोगी राजन कोठारी कर रहे हैं और इस काम में उनका सहयोग दया नेहलानी जी कर रहे हैं। फिल्म को दामूल और मृत्युदंड जैसे फिल्मों के रचयिता शैवाल जी ने लिखा है। फिल्म में यशपाल शर्मा, अनुपम श्याम ओझा, केके रैना, राजपाल यादव और मनोज पाहवां जैसे कई समृद्ध कलाकार काम कर रहे हैं। इस फिल्म की शूटिंग इन दिनों महाराष्ट्र में चल रही है।

Tuesday, November 15, 2011

Thursday, December 31, 2009

हैप्पी न्यू ईयर

नये साल में नई उमंग से...
मिलने हम हैं कदम बढ़ाए.
हंसी-खुशी से बाल पतंग से...
नहीं है ईर्ष्या लेस मात्र भी
सबको गले लगाते हैं.
मंगलमय है वर्ष तुम्हारा दैव से
सदा मनाते हैं.
मिले सारी खुशियां जग की छुलो
नभ की ऊंचाइयों को...
ईश्वर हमेशा दूर रखे
विपदा और तन्हाइयों को.
यहीं हैं कामना एक हमारी
हर पल सफलता मुले तुझे.
नहीं है चाहत और किसी का
आशीष बस दे देना मुझे.

Wednesday, December 23, 2009

बिल्ले का आतंक

बुधवार को मैं जैसे ही न्यूज रुप में घुसा। असाइंमेंट के मेरे एक दोस्त ने कहा कि सर मैं आज को एक मजेदार न्यूज दे रहा हूं। इसके बाद मैंने कहा कि क्या किसी लड़की ने तुम्हें परपोज कर दिया है कि इतने खुश हो रहे हो? उसने कहा नहीं सर। इन दिनों उज्जैन के बड़नगर में एक खूनी बिल्ले का आतंक पसरा हुआ है। ये सुनते ही मैंने झट से उससे कहा कि तुम बहुत ही संवेदनहीन व्यक्ति हो यार। आतंक की बात कर रहे हो और दुखी होने की जगह खुश हो रहे हो। फिर उसका जवाब आया सर इस घटना में एक मजेदार बात ये हैं कि ये बिल्ला केलव और केवल महिलाओं को ही अपना शिकार बना रहा है। उसके मुंह से ये बात निकली ही थी कि मेरे नजरों के सामने एमएनएस प्रमुख राज ठाकरे का चेहरा मंडराने लगा। साथ ही दिमाग ने अपनी शातिर हरकतें शुरू कर दी। कुछ देर के लिए मैं अपने काम और साथियों को भूल कर ख्यालों में खो गया और तुलना करने लगा कि इस बिल्ले और राज ठाकरे में काफी सम्मानताएं हैं। ये बिल्ला भी खूनी है और राज ठाकरें भी। ये बिल्ला महिलाओं को अपना शिकार बनाता है, तो राज ठाकरे निहत्थे और निर्दोष लोगों को। इन दोनों ही घटना में किसी के आंखों की नींद हराम है, तो किसी को खुशी मिल रही है। बाईस दिसंबर को एमएनएस के गुंडों ने जिस तरह से सिद्धिविनायक मंदिर के बाहर सो रहे निर्दोष साधुओं कहर ढाहा, वो क्या किसी बहशी जानवरों की कहरकतों से कम था। उन बेचारे साधुओं का क्या कसूर था कि दरिंदों ने उन्हें बेरहमी से पीटा। हां तुलना के दौरान उज्जैन के बिल्ले और मुंबई के इस पिल्ले में मैंने जो भिनता पाई, वो ये थी कि उज्जैन के बिल्ले को काबू में करने के लिए वन विभाग के अधिकारियों ने वड़नगर में डेरा डाल रखा है, लेकिन मुंबई के इस पिल्ले पर लगाम लगाने की जगह महाराष्ट्र सरकार ने इस छुट दे रखी है। वो हर बार कोई ना कोई बहान बना कर राज ठाकरे और उसके गुंडों पर कार्रवाई करने से बच जाती है। मंगलवार को भी महाराष्ट्र सरकार ने खबरियां चैनलों के एमएनएस के गुंडों की करतूत दिखाए जाने के बाद जांच करवाने का बहाना बना कर पल्ला झाड़ लिया।

Friday, November 20, 2009

टैम की मनमानी: आखिर कब तक?

लगता है टैम ने छोटे चैनलों को मिटाने की ठान ली है। इसके लिए उसने एड एजेंसियों से हाथ मिलाया है और अब वो छोटे चैनलों को निगलने के लिए रोज ऊल-जुलूल नियम बना रहा है। ये सब वो अपना पिटारा भरने के लिए कर रहा है। पैसा कमाने के लिए टैम किसी भी हद तक जाने को तैयार दिखता है। सबसे हैरान कर देने वाली बात ये है कि वो न तो सरकार से डर रहा है और न ही उसे अदालती पचड़ों का खौफ है। अब आप सोच रहे होंगे कि हम ऐसा क्यों कह रहे हैं, तो चलिए पहले आपको बताते हैं कि टैम है क्या। टैम एक संस्था है, जो चैनलों की मॉनीटरिंग करती है। टैम सभी चैनलों को तीन तरह के डाटा देता है। इसकी एवज में भारी भरकम फीस वसूलता है। टैम जो तीन डाटा देता है वो हैं- व्यूवरशिप डाटा, चैनल मोनिटरिंग का डाटा और एडेक्स सेवा। व्यूवरशिप डाटा में टैम हर चैनल की टीआरपी यानि टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट और जीआरपी यानि ग्रास रेटिंग प्वाइंट दिखाता है। व्यूवरशिप परखने के लिए टैम सभी चैनलों पर दिखाए जाने वाले प्रोग्रामों और खबरों पर नजर रखता है। चैनल मॉनिटरिंग और एडेक्स के जरिए टैम अलग अलग चैनलों पर चलने वाले विज्ञापनों पर नजर रखता है। चैनल मोनिटरिंग के तहत टैम सभी चैनलों ये नजर रखता है कि किसी चैनल पर कौन सा विज्ञापन किसी समय में कितनी बार चला, जबकि एडेक्स में टैम केवल और केवल विज्ञापनों पर नजर रखता है। इन तीनों डाटा को उपलब्ध कराने के लिए टैम ने अपनी अलग- अलग फीस रखी हुई है। व्यूवरशिप डाटा के लिए टैम ने डेढ़ लाख रुपये प्रति माह की फीस तय की है, जबकि चैनल मॉनिटरिंग के लिए वो पचास हजार रुपए महीना वसूलता है। एडेक्स के लिए उसने सभी चैलनों को डेढ़ लाख रुपया प्रति माह देने को कहा है। यानी तीनों डाटा की फीस मिलाकर साढे तीन लाख रुपये। पहले ये फीस टैम अगल-अलग वसूलता था। यानि अगर कोई चैनल सिर्फ एक डाटा चाहता है तो वो सिर्फ उसकी फीस देकर उसे पा सकता था। बड़े चैनल तो तीनों डाटा खरीदते रहे हैं, लेकिन परेशानी छोटे बजट के चैनलों की है। जो टैम की भारी भरकम फीस (3.50 लाख महीना) नहीं भर सकते। ऐसे में छोटे चैनल टैम से कोई एक ही डाटा खरीदते थे और इस डाटा को दिखाकर वे भी ठीक ठाक विज्ञापन ले लिया करते थे। लेकिन अब टैम ने बड़ी विज्ञापन एजेंसियों के साथ अजीब तरह का गठजोड़ कर लिया है। इन एड एजेंसियों ने तय किया है कि वे उसी चैनल को विज्ञापन मुहैया कराएंगी जिसके पास टैम के तीनों डाटा उपलब्ध होंगे। इसी का पूरा फायदा उठा रहा है टैम। अब छोटे खासकर रीजनल चैनलों पर मुसीबत आ गई है। वे टैम के तीनों डाटा खरीदने के लिए साढ़े पांच लाख महीने की फीस आखिर कैसे चुकाएं? अगर ये पैसा नहीं चुकाया जाता तो विज्ञापनों से हाथ धोना पड़ रहा है। अब सवाल ये उठता है कि अगर ये छोटे चैनल टैम के खिलाफ लड़ाई भी लड़ें तो किसके सहारे। उनके लिए तो इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फेडरेशन (आईबीएफ) भी किसी काम का नहीं है जो चैनलों को उनका हक दिलाने का नारा लगाता है। दरअसल आईबीएफ ने भी अपनी मेंबरशिप फीस साढ़े पांच लाख रुपये रखी हुई है। इसके अलावा आईबीएफ अपने मेंबरों से हर साल ढाई लाख रुपये की अलग फीस भी लेता है। छोटे चैनल ये फीस भी नहीं भर सकते। आखिर वे करें तो क्या करें? लेकिन ये चैनल भी हार मानने वाले नहीं हैं। ऐसे सभी चैनलों ने मिलकर टैम के खिलाफ एक निर्णायक जंग लड़ने का मन बनाया है। खुद को जिंदा रखने के लिए वे अब एक अलग फेडरेशन बनाने की तैयारी कर रहे हैं। इसके लिए दर्जनों रीजनल चैनलों के संचालकों और निदेशकों की बैठकें भी हो रही हैं। इस जंग में कौन जीतेगा ये बाद की बात है, लेकिन बड़ा सवाल ये बन गया है कि क्या टैम की झोली भरे बिना किसी भी चैनल की सांस चलनी असंभव है? क्या टैम यूं ही अपनी मनमानी करता रहेगा और सरकार देखती रहेगी?

Tuesday, October 6, 2009

माफ कीजिए...

दुनियाभर के दार्शनिकों ने प्रजातंत्र को अलग-अलग तरह से परिभाषित किया है। उन दार्शनिकों में एक नाम अरस्तु का भी है। उन्होंने प्रजातंत्र को मूर्खों का सरकार बताया था। उनकी इस परिभाषा से मिलती-जुलती एक परिभाषा मैंने भी लिखी है। ये परिभाषा मैंने मौजूदा समय के नेताओं की बदजुबानी को सुन कर तैयार किया है। नहीं तो मेरी औकात नहीं है कि मैं अरस्तु और सुकरात जैसे दार्शनिकों का नाम लूं और उनकी समकक्षता करने की हिम्मत जुटा पाऊं। मैं सबसे पहले उन महान दार्शनिकों और प्रजातंत्र के संस्थापकों से माफी मांगता हूं। साथ ही उन लोगों से भी क्षमा प्रार्थी हूं, जिन्हें मेरी इस परिभाषा से ठेस पहुंचेगा। सही मायने में कहूं, तो ये परिभाषा मैंने नहीं, बल्कि हमारे देश के नेताओं ने ही गढ़ी है। उन्होंने ही अरस्तु की परिभाषा को बदलने का साहस किया है। हमारे देश के की वजह से प्रजातंत्र ना जनता का सरकार है और ना ही मुर्खों का अब ये बतमीजों का सरकार बन गया है। अब आप खुद ही देख लीजिए कि हमारे देश के नेताओं में किस तरह से बतमीजी करने की रेस लगी है। समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह हो या कांग्रेसी नेता सत्यब्रत चतुर्वेदी। राबड़ी देवी हो या लालू प्रसाद यादव। सभी इस रेस में शामिल है और एक-दूजे को पछाड़ने में जुटे हुए हैं। ठाकरे बंधुओं ने तो इस अपनी बपौती ही बना लिया है। अब इस रेस में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण भी कूद पड़े हैं। नादेड़ में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने एमएनएस प्रमुख राज ठाकरे को बरसाती मेंढक करार दे दिया। उन्होंने कहा कि राज ठाकरे उस मेंढक की तरह है, जो चुनावों का मानसून आने पर बाहर निकल आते हैं और टर्राना शुरू कर देते हैं।इससे पहले ठाकरे ठाकरे बंधु एक-दूसरे के खिलाफ ऐसे ढेरों शब्दों का इस्तेमाल कर चुके हैं।शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने राज की तुलना एक ठेकेदार से की थी, जो दिहाड़ी पर कांग्रेस-राकांपा गठबंधन के लिए काम कर रहा है। इसके जवाब में राज ने उद्धव को एक ऐत्या बिलावर नागोबा करार दिया। ये मराठी भाषा की कहावत है, जिसका मतलब एक ऐसे सांप से है, जो अपना घर खुद बनाने के बजाय बने बनाए घर पर कब्जा जमाने की फिराक में रहता है।

Wednesday, September 16, 2009

तुगलकों की भरमार है...

कौन कहता है कि तुलगलों का शासन समाप्त हो गया है? कौन कहता है कि तुगलक अब हमारे देश में ही नहीं हैं? मेरी नजर में तो भारत में तुलगकों की भरमार है। मौजूदा समय में भी उन्हीं का शासन है। हां फर्क सिर्फ इतना है कि इस समय के तुगलकों को मोहम्मद बिन तुकलक या ग्यासुद्दीन तुगलक के नाम से नहीं जानते हैं। उन्हें हम महेंद्र सिंह टिकैत और राजनाथ सिंह जैसे नामों से पुकारते हैं। ये लोग भी ठीक तुगलकों की अंदाज में ही अपना फरमान सुना रहे हैं। हालिया फरमान खुद को पश्चिमी यूपी में किसानों के नेता कहने वाले महेंद्र सिंह टिकैत की ओर से आया है। उन्होंने कहा है कि एक ही गोत्र में शादी करने वालों को पहले सबके सामने बेइज्जत करना चाहिए। अगर वे फिर भी न मानें, तो जान से मार देना चाहिए। उन्होंने ये फतवा मुजफ्फरनगर में एक जाट पंचायत में जारी किया है। इस पंचायत में उन्होंने ऐसे जोड़ों के परिजनों का सामाजिक बायकॉट करने का भी ऐलान किया। इससे पहले एक फतवा बीजेपी नेता राजनाथ सिंह की तरफ से जारी किया गया था। हरियाण के हिसार में अपनी मूंछों पर ताव फेरते हुए उन्होंने कहा था कि जिन्ना के बारे में बात करने वालों के लिए बीजेपी में कोई जगह नहीं है। यानि जो जिन्ना के बारे में बोलेगा, वो बाहर जाएगा। राजनाथ सिंह का ये बयान जसवंत सिंह की किताब जिन्ना, भारत-विभाजन के आईने में’ पर उठे बवाल के बाद आया था। उस समय बीजेपी ने जसवंत सिंह को बाहर का रस्ता भी दिखा दिया था।